What is the Citizenship Amendment Bill 2019?

The Background पृष्ठभूमि

नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2019, बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में प्रताड़ित धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता प्रदान करने से सम्बंधित है। इन देशों में पिछले कई दशकों से हिन्दुओं, सिख, जैन, बौद्ध और पारसी लोगों के साथ शारीरिक एवं मानसिक उत्पीड़न हो रहा है। इसलिए इन धर्मों के अनुयायी समय-समय पर विस्थापित होकर भारत आते रहे हैं। तकनीकी तौर पर उनके पास भारत की नागरिकता हासिल करने का कोई ठोस दस्तावेज उपलब्ध नहीं होता है। अतः एक भारतीय नागरिक को मिलने वाली सुविधाओं से वह वंचित ही रहे हैं।

धार्मिक आधार पर भेदभाव एक शर्मनाक घटना है। जिसका किसी भी राष्ट्र में होना वहां के मानवीय मूल्यों का ह्रास दर्शाता है। पाकिस्तान की नेशनल असेम्बली के अनुसार हर साल 5,000 विस्थापित हिन्दू भारत आते हैं। (डॉन, 13 मई, 2014

यह संख्या आधिकारिक आंकड़ों से बहुत ज्यादा है। हमारे पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों खासकर हिन्दुओं को जबरन धर्म परिवर्तन, नरसंहार, बलात्कार और संपत्तियों पर अवैध कब्जा सहना पड़ता है। इन सबसे बचकर जब वह भारत आते हैं, तो यहां उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरी मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल सकती। यह पूर्ण रूप से मानवीय अधिकारों का हनन है।

A Brief Introduction एक संक्षिप्त परिचय

  • नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2019 को राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने 12 दिसंबर को मंजूरी दे दी। इसके साथ ही अब यह अधिनियम बन चुका है। इस विधेयक को लोक सभा ने 9 दिसंबर और राज्य सभा ने 11 दिसंबर को अपनी मंजूरी दे दी थी। यह अधिनियम इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों से लिखा जायेगा तथा यह धार्मिक प्रताड़ना के पीड़ित शरणार्थियों को स्थायी राहत देगा।
  • नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 में अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से धार्मिक प्रताड़ना के कारण भारत आए हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के लोगों को भारतीय नागरिक बनाने का प्रावधान है।
  • इसके उद्देश्यों एवं कारणों में कहा गया है कि ऐसे शरणार्थियों को जिन्होंने 31 दिसंबर 2014 की निर्णायक तारीख तक भारत में प्रवेश कर लिया है, उन्हें अपनी नागरिकता संबंधी विषयों के लिए एक विशेष विधायी व्यवस्था की जरूरत है। अधिनियम में हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के प्रवासियों को भारतीय नागरिकता के लिये आवेदन करने से वंचित न करने की बात कही गई है।
  • इसमें कहा गया है कि यदि कोई ऐसा व्यक्ति नागरिकता प्रदान करने की सभी शर्तों को पूरा करता है, तब अधिनियम के अधीन निर्धारित किये जाने वाला सक्षम प्राधिकारी, अधिनियम की धारा 5 या धारा 6 के अधीन ऐसे व्यक्तियों के आवेदन पर विचार करते समय उनके विरुद्ध ‘अवैध प्रवासी’ के रूप में उनकी परिस्थिति या उनकी नागरिकता संबंधी विषय पर विचार नहीं करेगा।
  • नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 बनने से पहले भारतीय मूल के बहुत से व्यक्ति जिनमें अफगानिस्तान, बांग्लादेश, पाकिस्तान के उक्त अल्पसंख्यक समुदायों के व्यक्ति भी शामिल हैं, वे नागरिकता अधिनियम 1955 की धारा 5 के अधीन नागरिकता के लिए आवेदन करते थे। किंतु यदि वे अपने भारतीय मूल का सबूत देने में असमर्थ थे, तो उन्हें उक्त अधिनियम की धारा 6 के तहत “प्राकृतिकरण” (Naturalization) द्वारा नागरिकता के लिये आवेदन करने को कहा जाता था। यह उनको बहुत से अवसरों एवं लाभों से वंचित करता था।
  • इसलिए नागरिकता अधिनियम 1955 की तीसरी अनुसूची का संशोधन कर इन देशों के उक्त समुदायों के आवेदकों को “प्राकृतिकरण” (Naturalization) द्वारा नागरिकता के लिये पात्र बनाया गया है। इसके लिए ऐसे लोगों मौजूदा 11 वर्ष के स्थान पर पांच वर्षों के लिए अपनी निवास की अवधि को प्रमाणित करना होगा।
  • नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 में वर्तमान में भारत के कार्डधारक विदेशी नागरिक के कार्ड को रद्द करने से पूर्व उन्हें सुनवाई का अवसर प्रदान करने का प्रावधान है।
  • उल्लेखनीय है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 में संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत आने वाले पूर्वोत्तर राज्यों की स्थानीय आबादी को प्रदान की गई संवैधानिक गारंटी की संरक्षा और बंगाल पूर्वी सीमांत विनियम 1973 की “आंतरिक रेखा प्रणाली” के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों को प्रदान किये गए कानूनी संरक्षण को बरकरार रखा गया है। नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 की मुख्य बातें
  • नागरिकता (संशोधन) अफगानिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक उत्पीड़न के कारण वहां से आए हिंदू, ईसाई, सिख, पारसी, जैन और बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों को अधिनियम, 2019 के तहत पाकिस्तान, भारत की नागरिकता दी जाएगी।
  • ऐसे शरणार्थियों को जिन्होंने 31 दिसंबर 2014 की निर्णायक तारीख तक भारत में प्रवेश कर लिया है, वे भारतीय नागरिकता के लिए सरकार के पास आवेदन कर सकेंगे।
  • अभी तक भारतीय नागरिकता लेने के लिए 11 साल भारत में रहना अनिवार्य था। नए अधिनियम में प्रावधान है कि पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यक अगर पांच साल भी भारत में रहे हों, तो उन्हें नागरिकता दी जा सकती है।
  • यह भी व्यवस्था की गयी है कि उनके विस्थापन या देश में अवैध निवास को लेकर उन पर पहले से चल रही कोई भी कानूनी कार्रवाई स्थायी नागरिकता के लिए उनकी पात्रता को प्रभावित नहीं करेगी।
  • ओसीआई कार्डधारक यदि शर्तों का उल्लंघन करते हैं तो उनका कार्ड रद्द करने का अधिकार केंद्र को है, पर उन्हें सुना भी जाएगा।

Mahatma Gandhi Prayed on 26 September 1947

सभा में खुले तौर पर घोषणा की पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दू और सिख, हर नजरिए से भारत आ सकते हैं, अगर वे वहां निवास नहीं करना चाहते हैं। उस स्थिति में, उन्हें नौकरी देना और उनके जीवन को सामान्य बनाना भारत सरकार का पहला कर्तव्य है।

This bill will provide opportunity for millions of people to live with respect

मा. गृहमंत्री श्री अमित शाह द्वारा संसद में दिए वक्तव्य के मुख्य बिंदु:

केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने संसद में नागरिकता (संशोधन) विधेयक 2019 पर बोलते हुए कहा कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान, इन तीन देशों के अल्पसंख्यकों को ही नागरिकता देने का प्रावधान इस विधेयक में है। प्रस्तुत हैं इसके मुख्य बिंदुः

Bill aims विधेयक का उद्देश्य

  • यह विधेयक करोड़ों लोगों को सम्मान के साथ जीने का अवसर प्रदान करेगा।
  • पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए अल्पसंख्यकों को भी जीने का अधिकार है। इन तीनों देशों में अल्पसंख्यकों की आबादी में काफी कमी हुई है, वह लोग या तो मार दिए गए, उनका जबरन धर्मांतरण कराया गया या वे शरणार्थी बनकर भारत में आए।
  • तीनों देशों से आए धर्म के आधार पर प्रताड़ित ऐसे लोगों को संरक्षित करना इस विधेयक का उद्देश्य है।
  • भारत के अल्पसंख्यकों का इस बिल से कोई अहित नहीं है।
  • इस बिल का उद्देश्य उन लोगों को सम्मानजनक जीवन देना है जो दशकों से पीड़ित थे ।
  • यह उन निश्चित वर्गों के लिए है, जिनके धर्म के अनुसरण के लिए इन तीन देशों में अनुकूलता नहीं है, उनको प्रताड़ित किया जा रहा है।
  • इसमें उन तीन देशों के अल्पसंख्यकों को ही नागरिकता देने का प्रावधान है।

Who will Citizenship नागरिकता किसे मिलेगी

  • पाकिस्तान, बंगलादेश और अफ़गानिस्तान, इन तीन देशों की जो सीमाएं भारत को छूती हैं, उन तीनों देशों में हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, ईसाई और पारसी, वहां की लघुमती के लोग, जो भारत में आए हैं, वे किसी भी समय आए हों, उनको नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान इस विधेयक में है।
  • जो किसी भी तरह से भारत के संविधान के किसी भी प्रावधान के खिलाफ नहीं जाते हैं ऐसे शरणार्थियों को उचित आधार पर नागरिकता प्रदान करने के प्रावधान हैं। विधेयक में प्रावधान
  • धार्मिक प्रताड़ना के आधार पर जो लोग आए हैं, उनको नागरिकता देने का सवाल है।
  • हिन्दू, सिख, जैन, पारसी, बौद्ध और ईसाई, जो पाकिस्तान, बंगलादेश हिन्दू, सिख, जैन, और अफ़गानिस्तान, इन तीन देशों से आते हैं, उनको अवैध प्रवासी नहीं माना जाएगा। इससे उनको मुक्ति दे दी गई है।
  • यदि धार्मिक उत्पीड़न के शिकार तीन देशों से आते हैं, उपरोक्त प्रवासी निर्धारित की गई शर्तों और प्रतिबंधों के तौर-तरीकों उनको अवैध प्रवासी को अपना कर रजिस्ट्रेशन कराते हैं, नहीं माना जाएगा। तो उनके माध्यम से वे भारत की इससे उनको मुक्ति दे नागरिकता ले पाएंगे।
  • ऐसे प्रवासी अगर नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 5 या तीसरे शैड्यूल की शर्ते पूरी करने के उपरांत नागरिकता प्राप्त कर लेते हैं, तो जिस तिथि से वे भारत में आए हैं, उसी तिथि से उनको नागरिकता दे दी जाएगी।
  • पश्चिमी बंगाल के अन्दर ढेर सारे शरणार्थी आए हुए हैं, अगर वे 1955 में आए, 1960 में आए, 1970 में आए, 1980 में आए, 1990 में आए या 2014 की 31 दिसंबर के पूर्व आए, उन सभी को उसी तिथि से नागरिकता दी जाएगी, जिस तिथि से वे आए हैं।
  • इससे उनको कोई LEGAL CONSEQUENCE FACE नहीं करना पड़ेगा।
  • अगर ऐसे अल्पसंख्यक प्रवासी के खिलाफ अवैध प्रवास या नागरिकता के बारे में, घुसपैठ या नागरिकता के बारे में कोई भी केस चल रहा है, तो वह केस इस बिल के विशेष प्रावधान से वहीं पर समाप्त हो जाएगा। वह LEGAL PROCEEDING उसको FACE नहीं करना पड़ेगा।
  • कई जगह कुछ जो शरणार्थी आए हैं, उन्होंने छोटी-मोटी दुकान खरीद में कोई भी केस चल ली है, वे अपना काम कर रहे हैं। रहा है, तो वह केस कानून की दृष्टि में हो सकता है कि इस बिल के विशेष वह अवैध हो, गैर-कानूनी हो। मगर प्रावधान से वहीं पर यह बिल उनको protect करता है समाप्त हो जाएगा। कि उन्होंने भारत में अपने निवास के वह LEGAL समय में जो कुछ भी किया है, उसको PROCEEDING यह बिल regularize कर देगा। उनकी उस status को कहीं पर भी वंचित नहीं करेगा।
  • जैसे किसी की शादी हुई, बच्चे हुए, इन सब चीजों को यह बिल regularize करेगा।

Shall not apply in the north-eastern states Bill | उत्तर-पूर्व के राज्यों में लागू नहीं होगा विधेयक

  • जो पूर्वोत्तर के राज्य हैं, उनके अधिकारों को, उनकी भाषा को, उनकी संस्कृति को और उनकी सामाजिक पहचान को preserve करने के लिए, उनको संरक्षित करने के लिए भी इसके अंदर प्रावधान हुए हैं।
  • जनजातीय इलाकों पर यह बिल लागू नहीं होगा।
  • उत्तर-पूर्व के सभी राज्यों में जो प्रोटेक्शन दिया गया है, उसी को आगे बढ़ाते हुए, Sixth Schedule में असम, मेघालय, मिज़ोरम, त्रिपुरा और अब पूरा मणिपुर भी नोटिफाई हो चुका है।
  • इसी तरह Bengal Eastern Frontier Regulation Act, 1973 के तहत Inner Line Permit के इलाके, पूरा मिज़ोरम, अरुणाचल प्रदेश, अधिकांश नागालैंड और मणिपुर, इन सारे एरिया में भी ये प्रावधान लागू नहीं होंगे।
  • असम के सभी मूल निवासियों की सभी हितों की चिंता क्लॉज़- 6 कमिटी के माध्यम से किया जायेगा ।
  • उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों के लोगों की आशंकाओं को दूर करते हुए माननीय गृह मंत्री जी ने कहा कि क्षेत्र के लोगों की भाषाई, सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान को संरक्षित रखा जाएगा और इस विधेयक में संशोधन के रूप में इन राज्यों के लोगों की समस्याओं का समाधान है।

Is not against the Muslim community legislation| मुस्लिम समुदाय के खिलाफ नहीं है यह विधेयक

  • नागरिकता (संशोधन) विधेयक 2019 पर बोलते हुए केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कहा की ‘एक बहुत बड़ी भ्रांति फैलाई जा रही है कि यह बिल माइनॉरिटी के खिलाफ है, यह बिल विशेषकर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ है
  • श्री अमित शाह ने कहा ‘जो इस देश के मुसलमान हैं, उनके लिए इस देश के अंदर किसी चिंता की सवाल ही नहीं है।’
  • श्री नरेंद्र मोदी सरकार के होते हुए इस देश में किसी भी धर्म के नागरिक को डरने की जरूरत नहीं है, यह सरकार सभी को सुरक्षा और समान अधिकार देने के लिए प्रतिबद्ध है।
  • श्री अमित शाह ने कहा कि मोदी जी के शासनकाल में पिछले 5 वर्षों में 566 से ज्यादा मुस्लिमों को भारत की नागरिकता दी गई।
  • श्री शाह ने कहा कि यह बिल सिर्फ नागरिकता देने के लिए है किसी की नागरिकता छीनने का अधिकार इस बिल में नहीं है।
  • श्री नरेंद्र मोदी सरकार मानती है कि जिनकी प्रताड़ना हुई है, उन सबकी मदद सरकार को करनी चाहिए।
  • श्री शाह ने कहा ‘वे नागरिक हैं, नागरिक रहेंगे, उन्हें कोई प्रताड़ित नहीं कर सकता।
  • यहां के minority और विशेषकर किसी भी मुसलमान को चिंता करने की जरूरत नहीं है।

Some questions and answers|कुछ प्रश्न एवं उनके उत्तर

नागरिकता संशोधन विधेयक, 2019, की संवैधानिकता पर सवाल उठाए गए हैं और इसे मनमाना, भेदभावपूर्ण और भारतीय राज्य के धर्मनिरपेक्ष चरित्र के खिलाफ होने का दावा किया जा रहा है। इन सवालों का मूल्यांकन करने के लिए और उस मिथक को तोड़ने के लिए, जो इस संशोधन के खिलाफ प्रचारित किया जा रहा है एवं इसकी वैधता का पता लगाने के लिए कुछ सवालों के जवाब निम्नवत हैं:

1. भारत अपने नागरिकों को कैसे परिभाषित करता है और भारतीय नागरिकता के मानदंड के लिए राजनीतिक, संवैधानिक और कानूनी पृष्ठभूमि क्या है?

  • भारतीय नागरिकता के विचार को समझने के लिए हमें संविधान सभा के दौर में जाना होगा। पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान से शरणार्थियों की भारी संख्या के बीच भारतीय संविधान निर्माताओं के लिए नागरिकता के प्रावधानों का मसौदा तैयार करना लगभग असंभव था। 
  • क्योंकि उस समय की स्थिति नागरिकता के प्रावधानों को अंतिम रूप देने के लिए अनुकूल नहीं थी, नागरिकता का मुद्दा संविधान के भाग II में अनुच्छेद 11 पर निर्भर था जो संसद को भारतीय नागरिकता के लिए एक विस्तृत रूपरेखा तैयार करने का विशेषाधिकार देता है। इस के कारण नागरिकता अधिनियम, 1955 अस्तित्व में आया। इसलिए, यह कहना गलत है कि संसद को नागरिकता के मानदंडों में कोई बदलाव लाने का कोई अधिकार नहीं है, यह तर्क संविधान निर्माताओं के इरादों के विपरीत है। सच्चाई यह है कि संविधान सभा ने कभी भी नागरिकता के मानदंडों को अंतिम रूप नहीं दिया, बल्कि संसद को संविधान ने भारतीय नागरिकता के मानदंड को अंतिम रूप देने का अधिकार दिया है।

2. यह नागरिकता संशोधन विधेयक क्यों आवश्यक है?

  • भारत का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था और पूर्व और पश्चिम पाकिस्तान का सामना करना पड़ा। विभाजन के दौरान भारत ने इन अल्पसंख्यकों को आश्वासन देते हुए कहा था कि यदि उनके मूल देश नेहरू-लियाकत संधि के तहत उन्हें दायित्व के अनुसार सुरक्षा देने में विफल रहते हैं तो भारत उनके जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करेगा। इसलिए, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के इन उत्पीडित वर्गों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए यह विधेयक आवश्यक था और उन्हें भारत में नागरिकता का अधिकार दिया जा रहा है, जहां वे दशकों से अवैध प्रवासियों के रूप में रह रहे हैं। 

3. वर्तमान संशोधन क्या है? यह क्या कहता है और इसके परिणाम क्या हैं?

  • 1955 अधिनियम के अनुसार किसी भी व्यक्ति को भारतीय नागरिकता देने के लिए जन्म, वंश, प्राकृतिकरण, पंजीकरण और भारत द्वारा किसी भी क्षेत्र का अधिग्रहण जैसी पांच श्रेणियां हैं। नागरिकता अधिनियम में यह संशोधन मुख्य रूप से प्राकृतिकरण की प्रक्रिया द्वारा नागरिकता देने के प्रस्ताव को संशोधित करता है
  • विधेयक के खंड 2 में नागरिकता अधिनियम, 1955 में कहता है कि अब कोई भी व्यक्ति जो अफगानिस्तान, बांग्लादेश या पाकिस्तान से आने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी या ईसाई समुदाय से संबंधित है, जिन्होंने 31 दिसंबर, 2014 से पहले भारत में प्रवेश किया था और जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920 की धारा 3 की उप-धारा (2) के उपखंड (सी) के तहत या विदेशी अधिनियम, 1946 या इसके तहत बनाए गए किसी भी नियम या आदेश के प्रावधानों से आवेदन की छूट दी गई है उनको नागरिकता अधिनियम के तहत अवैध प्रवासी नहीं माना जाएगा।
  • विधेयक का खंड 3 नागरिकता अधिनियम, 1955 में एक नई धारा 6 बी सम्मिलित करता है; यह विधेयक के खंड 2 के तहत और धारा 6 बी (2) के तहत संरक्षित व्यक्तियों के लिए प्राकृतिकरण द्वारा नागरिकता प्रमाण पत्र प्रदान करने का प्रावधान करता है, ऐसे व्यक्तियों को भारतीय क्षेत्र में उनके प्रवेश की तारीख से भारत का नागरिक माना जाएगा।
  • संशोधित अधिनियम की नई धारा 6बी (4) में यह प्रावधान है कि विधेयक के उपर्युक्त खंड 2 असम, मेघालय, मिजोरम या त्रिपुरा के आदिवासी क्षेत्र पर लागू नहीं होगा जैसाकि संविधान की छठी अनुसूची में शामिल है इसके अतिरिक्त बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन, 1873 के तहत अधिसूचित ‘द इनर लाइन’ क्षेत्रों में भी यह प्रावधान लागू नहीं होगा।
  • विधेयक का खंड 6 अधिनियम की तीसरी अनुसूची में संशोधन करता है, जो अधिनियम की धारा 1) 6) के तहत प्राकृतिकरण के लिए योग्यता प्रदान करता है। यह तीन मुस्लिम बहुल देशों से उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों के लिए प्राकृतिकरण द्वारा और वर्तमान मामले में नागरिकता के लिए नए आवेदन से संबंधित है। यह खंड अफगानिस्तान, बांग्लादेश या पाकिस्तान से आने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी या ईसाई समुदाय से संबंधित व्यक्तियों के लिए भारत में निवास या भारत सरकार के अंर्तगत सेवा शर्त को कम से कम पांच वर्ष करता है जो पूर्व में “कम से कम ग्यारह वर्ष” थी।
  • इसलिए, तीन मुस्लिम देशों के सताए हुए अल्पसंख्यक अब अधिनियम की धारा 6बी के तहत नागरिकता के हकदार हैं, जिन्होंने 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले भारत में प्रवेश किया है और उन्हें इस अधिनियम के तहत अवैध प्रवासी नहीं माना जाएगा और भारत में उनके इस तिथि के पूर्व आगमन पर उन्हें नागरिकता दी जाएगी। हालांकि, यदि 31 दिसंबर, 2014 के बाद उक्त व्यक्तियों का भारत में प्रवेश हुआ, तो वे अधिनियम की तीसरी अनुसूची के साथ पढ़े अधिनियम की धारा 6 के तहत नागरिकता के लिए पात्र होंगे, जो भारत में कम से कम 5 वर्षों के लिए उनके निवास का प्रावधान करता है। जो पहले 11 साल था, जैसा कि प्राकृतिकिकरण द्वारा नागरिकता पाने के लिए अन्य देशों के लोगों पर लागू होता है।

4. पाकिस्तान और वांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की स्थिति क्या है, और क्या विभाजन के 70 साल बाद भी उन्हें नागरिकता प्रदान करने के लिए भारत का कोई दायित्व है?

  • हम सभी जानते हैं कि भारत के पहले कानून मंत्री डॉ. बी आर अम्बेडकर एक दलित थे, लेकिन हम में से बहुत कम लोग जानते हैं कि पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री श्री जोगेंद्र नाथ मंडल भी दलित थे। श्री मंडल ने पाकिस्तान के दावे का खुलकर समर्थन किया था और अनुसूचित जाति समुदायों को असम में सिलहट जिले में एक जनमत संग्रह के दौरान मुस्लिम लीग के पक्ष में मतदान करने के लिए कहा था। नेहरू-लियाकत संधि के ठीक 6 महीने बाद पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री ने 8 अक्टूबर, 1950 को पाकिस्तान मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। उनका इस्तीफा पूर्व और पश्चिम पाकिस्तान में गैर-मुस्लिमों के खिलाफ बेहद भयावह हिंसा के विरोध में आया था। दुर्भाग्य से, श्री मंडल को भारत वापस आना पड़ा और शरणार्थी के रूप में उनकी मृत्यु पश्चिम बंगाल में हुई। इसलिए नेहरू-लियाकत समझौते का सम्मान करने में पाकिस्तान की विफलता के कारण, विभाजन के पीड़ितों को शरण देना भारतीय राज्य का एक संवैधानिक दायित्व बन जाता है।

5. क्या कानून के समक्ष कोई संवैधानिक चुनौती है और कैसे?

  • अनुच्छेद 14 संविधान में निहित समानता के अधिकार का मूल है। इसका मतलब यह नहीं है कि सभी सामान्य कानून सभी वर्गों के लोगों पर लागू होंगे। अनुच्छेद स्थापित समूहों या वर्गों के उचित वर्गीकरण की अनुमति देता है और इस तरह के वर्गीकरण में उस उद्देश्य के साथ उचित समझ विकसित होती है जिसे वह प्राप्त करना चाहता है। नागरिकता संशोधन विधेयक में वर्गीकरण दो कारकों पर आधारित है
  • देशों का वर्गीकरण अर्थात् अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश बनाम शेष देशों
  • लोगों का वर्गीकरण अर्थात हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई बनाम अन्य लोग अब इस भिन्नता (वर्गीकरण) का आधार उत्पीड़न और अल्पसंख्यक हैं। चूंकि ये तीनों देश एक रूप में इस्लाम को अपना राज्य धर्म मानते हैं और यहां धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं, इसलिए यहां अल्पसंख्यकों पर अत्याचार मामले सामने आते हैं। इसलिए उत्पीड़न और अल्पसंख्यक, दोनों ही इस वर्गीकरण का आधार हैं, और चूंकि नागरिकता प्रदान कर इन उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों के जीवन और स्वतंत्रता को सुनिश्चित कर इस वर्गीकरण के सही उद्देश्य को प्राप्त करना चाहती है इसलिए यह उचित वर्गीकरण की अनुमेय श्रेणी में आते हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा शायरा बानो मामले में पुनर्विचार सिद्धांत अनुचित, भेदभावपूर्ण, जो पारदर्शी नहीं, पक्षपातपूर्ण या भाई-भतीजावाद का एक मानक है, एक कानून के लिए मनमाना और असंवैधानिक होना का पर्यायवाची है। यहां इस मामले में मनमानी बिल्कुल भी लागू नहीं है क्योंकि एक उचित वर्गीकरण का आधार जो अल्पसंख्यक और उत्पीड़न वर्ग से संबंधित है उसके सही परिभाषित मापदंडों पर ऊपर चर्चा की गई है। इसलिए, यह कानून उचित वर्गीकरण और गैर-मनमानी के दोनों पैमानों को सफलतापूर्वक उत्तीर्ण करता

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के बचाव में भारतीय नेताओं के बयान

महात्मा गांधी जिन लोगों को पाकिस्तान से भगाया गया था, उन्हें पता होना चाहिए कि वे पूरे भारत के नागरिक थे उन्हें यह महसूस करना चाहिए कि वे भारत की सेवा करने और उनकी महिमा से जुड़ने के लिए पैदा हुए थे।
(12 जुलाई, 1947 की प्रार्थना सभा में)

पट्टाभि सीतारमैया, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस संघर्ष और पीड़ा का वह सिलसिला जारी है और बार-बार संकट पैदा करता है। वर्तमान में अनिवार्य रूप से पूर्व और पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यकों की रक्षा करने का मुद्दा है।
(कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में जारी वयान, 27 फरवरी, 1950)

जे.बी. कृपलानी, कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अंतिम भाषण हमें पाकिस्तान से आने वालों के लिए भारतीय संघ के सेवा और समझौतों के संदर्भ में केंद्रीय और प्रांतीय नियमों को सहज कर देना चाहिए।
(एआईसीसी, नई दिल्ली, 15 नवंवर, 1947)

जवाहर लाल नेहरू, भारत के प्रथम प्रधानमंत्री मुझे लगता है कि केंद्रीय राहत कोष का उपयोग करना वांछनीय होगा, जिसका उपयोग किसी भी प्रकार की आपातकालीन राहत के लिए किया जा सकता है, लेकिन जिसका उपयोग अब विशेष रूप से पाकिस्तान से शरणार्थियों के राहत और पुनर्वास के लिए किया जाना चाहिए, जो भारत आए हैं।
(नेशनल हेराल्ड, 25 जनवरी, 1948)

अबुल कलाम आज़ाद, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस शिक्षा मंत्रालय पाकिस्तान से पलायन कर दिल्ली आए सरकारी सेवा में कार्यरत अधिकांश शरणार्थी शिक्षकों को अवसर प्रदान करने की कोशिश कर रहा है।
(9 फरवरी, 1948 को सरदार पटेल को भेजा गया पत्र)

श्यामा प्रसाद मुकी , भारत के पहले अंतरिम मंत्रिमंडल में पूर्व मंत्री के रूप में मैं एक बात कहना चाहता हूं कि बंगाल की समस्या एक प्रांतीय समस्या नहीं है। यह एक अखिल भारतीय मुद्दे को उठाती है और इसके उचित समाधान पर पूरे देश की आर्थिक और राजनीतिक दोनों तरह की शांति और समृद्धि निर्भर करेगी।
(उद्योग और आपूर्ति मंत्री पद से इस्तीफे पर संवोधन, 19 अप्रैल, 1950)

Conclusion निष्कर्ष

दोस्तों अगर हम भारत की बात करें तो यहां पर मेरे हिसाब से ये लॉ अच्छा नहीं है
क्युकी ये भारत देश हर धर्म के नागरिक के लिए सामान नियम है
और ये सेक्युलर देश में से एक है इस लिए यहां पर ये नियम मेरे समझ से फिट नहीं
आप को कैसा लगा आप ज़रूर कमेंट के माधियम से बता सकते है

What is Citizenship Amendment Bill 2019 PDF?

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